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शल्य पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
कवन्धशतसङ्कीर्णं छत्रचामरशोभितम् |  २३   क
सेनावनं तच्छुशुभे वनं पुष्पाचितं यथा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति