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उद्योग पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
राष्ट्रात्प्रव्राजनं क्लेशं वनवासं च पाण्डव |  १३   क
कृष्णाय़ाश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति