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उद्योग पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
अप्रिय़ाणां च वचने प्रव्रजत्सु पुनः पुनः |  १४   क
अमर्षं दर्शय़ाद्य त्वममर्षो ह्येव पौरुषम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति