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वन पर्व
अध्याय २७४
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मातलिरु उवाच
शरीरधातवो ह्यस्य मांसं रुधिरमेव च |  ३१   क
नेशुर्व्रह्मास्त्रनिर्दग्धा न च भस्माप्यदृश्यत ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति