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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
श्वः सर्वसैन्यानुत्सृज्य जहि कर्ण धनञ्जय़म् |  २०   क
प्रेष्यवत्पाण्डुपाञ्चालानुपभोक्ष्यामहे ततः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति