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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
अथ वा निहते पार्थे पाण्डुष्वन्यतमं ततः |  २१   क
स्थापय़ेद्युधि वार्ष्णेय़स्तस्मात्कृष्णो निपात्यताम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति