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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
तस्मात्पर्णानि शाखाश्च स्कन्धं चोत्सृज्य सूतज |  २४   क
कृष्णं निकृन्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति