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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
हन्याद्यदि हि दाशार्हं कर्णो यादवनन्दनम् |  २५   क
कृत्स्ना वसुमती राजन्वशे ते स्यान्न संशय़ः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति