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वन पर्व
अध्याय २१८
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि |  ४६   क
वृहस्पतिर्मन्त्रविधिं जजाप च जुहाव च ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति