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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती तु रूपेण तेजसा यशसा श्रिय़ा |  १०   क
सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति