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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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वासुदेव उवाच
फल्गुनस्य हि तां मृत्युमवगम्य युय़ुत्सतः |  ३८   क
न निद्रा न च मे हर्षो मनसोऽस्ति युधां वर ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति