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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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वासुदेव उवाच
त्रैलोक्यराज्याद्यत्किञ्चिद्भवेदन्यत्सुदुर्लभम् |  ४१   क
नेच्छेय़ं सात्वताहं तद्विना पार्थं धनञ्जय़म् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति