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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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सञ्जय़ उवाच
इति सात्यकय़े प्राह तदा देवकिनन्दनः |  ४४   क
धनञ्जय़हिते युक्तस्तत्प्रिय़े सततं रतः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति