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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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धृतराष्ट्र उवाच
नूनं वुद्धिविहीनश्चाप्यसहाय़श्च मे सुतः |  ५   क
शत्रुभिर्व्यंसितोपाय़ः कथं नु स जय़ेदरीन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति