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आदि पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
न कुणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः |  १४   क
इदं समुपसर्पन्ति तत्किं समुपसर्पथ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति