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आदि पर्व
अध्याय १५८
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गन्धर्व उवाच
यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत्त्रिषु लोकेषु किञ्चन |  ४२   क
तत्पश्येद्यादृशं चेच्छेत्तादृषं द्रष्टुमर्हति ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति