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आदि पर्व
अध्याय १५८
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गन्धर्व उवाच
पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिवर्हणे |  ४७   क
दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति