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आदि पर्व
अध्याय १५८
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गन्धर्व उवाच
वज्रं क्षत्रस्य वाजिनो अवध्या वाजिनः स्मृताः |  ५०   क
रथाङ्गं वडवा सूते सूताश्चाश्वेषु ये मताः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति