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आदि पर्व
अध्याय १५८
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अर्जुन उवाच
यदि प्रीतेन वा दत्तं संशय़े जीवितस्य वा |  ५२   क
विद्या वित्तं श्रुतं वापि न तद्गन्धर्व कामय़े ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति