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शान्ति पर्व
अध्याय २२३
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वासुदेव उवाच
लोकस्य विविधं वृत्तं प्रकृतेश्चाप्यकुत्सय़न् |  १८   क
संसर्गविद्याकुशलस्तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति