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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थधर्मावनादृत्य यः पापे कुरुते मनः |  १२   क
कर्मणां पार्थ पापानां स फलं विन्दते ध्रुवम् |  १२   ख
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति