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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रमृद्य तरसा शैलं मानुषेण धनेश्वर |  १८   क
एकेन सहिताः सङ्ख्ये हताः क्रोधवशा गणाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति