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वन पर्व
अध्याय २८८
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वैशम्पाय़न उवाच
निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च |  १८   क
आतस्थे परमं यत्नं व्राह्मणस्याभिराधने ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति