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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
अथाभ्रघनसङ्काशं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम् |  २३   क
हय़ैः संय़ोजय़ामासुर्गान्धर्वैरुत्तमं रथम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति