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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
कुवेरस्तु महासत्त्वान्पाण्डोः पुत्रान्महारथान् |  ३०   क
आत्तकार्मुकनिस्त्रिंशान्दृष्ट्वा प्रीतोऽभवत्तदा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति