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आदि पर्व
अध्याय ३
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सूत उवाच
स कदाचिन्मृगय़ां यातः पारिक्षितो जनमेजय़ः कस्मिंश्चित्स्वविषय़ोद्देशे आश्रममपश्यत् |  ११   क
उपविष्टेषूपविष्टः शौनकोऽथाव्रवीदिदम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति