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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
शतशश्चापि गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः |  ३७   क
परिवार्योपतिष्ठन्त यथा देवाः शतक्रतुम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति