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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनीं शिरसा विभ्रद्भीमसेनः स्रजं शुभाम् |  ३८   क
वाणखड्गधनुष्पाणिरुदैक्षत धनाधिपम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति