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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
मामनादृत्य देवांश्च विनाशं यक्षरक्षसाम् |  ४६   क
स्ववाहुवलमाश्रित्य तेनाहं प्रीतिमांस्त्वय़ि |  ४६   ख
शापादस्मि विनिर्मुक्तो घोरादद्य वृकोदर ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति