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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं पूर्वमगस्त्येन क्रुद्धेन परमर्षिणा |  ४७   क
शप्तोऽपराधे कस्मिंश्चित्तस्यैषा निष्कृतिः कृता ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति