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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्फुरतश्च महाकाय़ान्गतसत्त्वांश्च राक्षसान् |  ५   क
महावलान्महाघोरान्भीमसेनेन पातितान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति