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वन पर्व
अध्याय १५८
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वैश्रवण उवाच
अध्वन्यहमथापश्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् |  ५२   क
उग्रं तपस्तपस्यन्तं यमुनातीरमाश्रितम् |  ५२   ख
नानापक्षिगणाकीर्णं पुष्पितद्रुमशोभितम् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति