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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
असमागम्य भीष्मेण संय़ुगे किं विकत्थसे |  १२   क
आरुरुक्षुर्यथा मन्दः पर्वतं गन्धमादनम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति