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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
को ह्याभ्यां जीविताकाङ्क्षी प्राप्यास्त्रमरिमर्दनम् |  १७   क
गजो वाजी नरो वापि पुनः स्वस्ति गृहान्व्रजेत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति