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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
प्राच्यैः प्रतीच्यैरथ दाक्षिणात्यै; रुदीच्यकाम्वोजशकैः खशैश्च |  २०   क
शाल्वैः समत्स्यैः कुरुमध्यदेशै; र्म्लेच्छैः पुलिन्दैर्द्रविडान्ध्रकाञ्च्यैः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति