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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
यदीदं कत्थनात्सिध्येत्कर्म लोके धनञ्जय़ |  २४   क
सर्वे भवेय़ुः सिद्धार्था वहु कत्थेत दुर्गतः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति