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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्र्या वुद्धिर्मनसा दर्शने च; स्पर्शे सिद्धिः कर्मणां या च सिद्धिः |  ५०   क
गणा देवानामूष्मपाः सोमपाश्च; लेखाः सुय़ामास्तुषिता व्रह्मकाय़ाः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति