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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
शस्त्रौघमक्षय़्यमतिप्रवृद्धं; यदावगाह्य श्रमनष्टचेताः |  ४०   क
भविष्यसि त्वं हतसर्ववान्धव; स्तदा मनस्ते परितापमेष्यति ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति