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उद्योग पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
तदा मनस्ते त्रिदिवादिवाशुचे; र्निवर्ततां पार्थ महीप्रशासनात् |  ४१   क
राज्यं प्रशास्तुं हि सुदुर्लभं त्वय़ा; वुभूषता स्वर्ग इवातपस्विना ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति