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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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धृतराष्ट्र उवाच
कर्णदुर्योधनादीनां शकुनेः सौवलस्य च |  १   क
अपनीतं महत्तात तव चैव विशेषतः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति