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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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गौतम उवाच
किं भवत्यै प्रय़च्छामि गुर्वर्थं विनिय़ुङ्क्ष्व माम् |  २५   क
प्रिय़ं हि तव काङ्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति