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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् |  ९   क
मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति