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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
अस्माकं हि वनस्थानां हैडिम्वेन महात्मना |  २७   क
वालेनापि सता तेन कृतं साह्यं जनार्दन ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति