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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
गन्धमादनय़ात्राय़ां दुर्गेभ्यश्च स्म तारिताः |  २९   क
पाञ्चाली च परिश्रान्ता पृष्ठेनोढा महात्मना ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति