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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः |  ५७   क
मार्गांश्च चरतश्चित्रान्व्यस्मय़न्त रणे जनाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति