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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
उपदिष्टो वधोपाय़ः कर्णस्य गुरुणा स्वय़म् |  ४१   क
व्याय़च्छतश्च खड्गेन द्विधा खड्गं चकार ह ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति