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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
न चागाद्द्वैरथं जिष्णुर्दिष्ट्या तं भरतर्षभ |  ५५   क
सृजेतां स्पर्धिनावेतौ दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति