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द्रोण पर्व
अध्याय १५८
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सञ्जय़ उवाच
नित्यं च पुरुषव्याघ्र धर्ममेव विचिन्तय़ |  ६१   क
आनृशंस्यं तपो दानं क्षमां सत्यं च पाण्डव ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति