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द्रोण पर्व
अध्याय १६८
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सञ्जय़ उवाच
स्वय़मेवात्मनो वक्तुं न युक्तं गुणसंस्तवम् |  १७   क
दारय़ेय़ं महीं क्रोधाद्विकिरेय़ं च पर्वतान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति