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शान्ति पर्व
अध्याय २०८
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गुरुरु उवाच
निःसन्दिग्धमनीहो वै मुक्तः सर्वपरिग्रहैः |  १५   क
विविक्तचारी लघ्वाशी तपस्वी निय़तेन्द्रिय़ः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति